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चुनी हुई कविताएं -रुस्तम

₹300 ₹300
by RUSTAM

"रुस्तम हमारे समय के विरल कवि हैं। वह उन थोड़े से कवियों में हैं जिनकी कविता न तो बाह्य जगत की अनुकृति है और न केवल आभ्यन्तर का आभास। उनके यहाँ दृश्य हैं, वस्तुएँ और पदार्थमयता भी, फिर भी लगता है जैसे कुछ अतिरिक्त भी है, कुछ अवरयथार्थ सरीखा।...... ये दृश्य हमें हठात् एक अतीन्द्रिय लोक में ले जाते हैं। और कविता अनेकानेक अर्थ वलयों से सम्पन्न हमें स्तब्ध कर देती है, जहाँ काल और देश की पारम्परिक अनुभूतियों-अवधारणाओं से बिलकुल अलग एक अप्रत्याशित कॉस्मॉस हमारे लिए खुलता है। सारे शब्द, वाक्य संयोजन, सब कुछ पहचाना हुआ होकर भी रहस्यमय और आधिभौतिक की सृष्टि करते हैं।...... ये कविताएँ हमसे एकान्त ध्यान की माँग करती हैं क्योंकि इनका सँभार और सौन्दर्य विलक्षण है। प्राय: मद्धम लय और आन्तरिक ताप से समृद्ध ये कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता की एक असम्भावित घटना की तरह हैं।" — अरुण कमल

YAADEN AUR KITABEN यादें और किताबें

₹400 ₹400
by MAMTA KALIA

"ममता कालिया ः 2 नवम्बर मथुरा में जन्मी ममता कालिया हिंदी साहित्य की अग्रपंक्ति में स्थान रखती हैं। वे हिंदी और इंग्लिश ,दोनों भाषाओँ में लिखती हैं किन्तु हिंदी को वे अपने ह्रदय की भाषा मानती हैं। दिल्ली मुंबई पुणे इंदौर की विभिन्न शिक्षा संस्थाओं से गुज़रते हुए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए इंग्लिश किया तथा वहीं प्राध्यापन भी। फिर वे मुंबई के एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय में परास्नातक विभाग में व्याख्याता बन गयीं। सन १९७३ से वे इलाहाबाद के एक डिग्री कॉलेज में प्राचार्य नियुक्त हुईं और वहीँ से सन २००१ में अवकाश ग्रहण किया। इन तथ्यों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है की सन १९६३ से लगा कर अब तक वे लगातार लिखती रही हैं और प्रासंगिक बनी हुई हैं .भारतीय समाज की विशेषताओं और विषमताओं पर अपनी पैनी नज़र रखते हुए ममता कालिया की प्रत्येक रचना के केंद्र में स्त्रीविमर्श उपस्थित है। विकासशील समाज में बनते बिगड़ते सम्बन्ध,प्रगति के आर्थिक,सामाजिक दबाव,स्त्री की प्रगति को देख कर पुरुष मनोविज्ञान की कुंठाएं और कामकाजी स्त्री के संघर्ष उनके प्रिय विषय हैं। प्रकाशित पुस्तकों की संख्या विपुल होने के कारण यहाँ केवल उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकों का उल्लेख किया जा रहा है। ममता कालिया ने कविता,कहानी,उपन्यास,संस्मरण,नाटक,यात्रा साहित्य और निबंधों से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। प्रमुख उपन्यास- १. बेघर, 2.नरक दर नरक, ३ तीन लघु उपन्यास., 4. दौड़., ५.दुक्खम-सुक्खम., ६.सपनों की होम डेलिवरी., ७ कल्चर -वल्चर। प्रमुख कहानी संग्रह- १छुटकारा 2.सीट नंबर छह ३.उसका यौवन, 4.एक अदद औरत.५.जांच अभी जारी है.६.निर्मोही.7.मुखौटा.८.बोलने वाली औरत.9.थोडा सा प्रगतिशील.१०.खुशकिस्मत. कविता-संग्रह- १ A Tribute to Papa @ other Poems. 2.Poems 78. ३, खांटी घरेलू औरत, 4. पचास कवितायें. ५. कितने प्रश्न करूं संस्मरण.- १ कल परसों के बरसों २. कितने शहरों में कितनी बार. निबंध संग्रह- १ भविष्य का स्त्री विमर्श 2.स्त्री विमर्श का यथार्थ. ममता कालिया ने अनेक कहानी संकलनों का संपादन किया है तथा ५ वर्ष महात्मा गाँधी हिंदी अंतर राष्ट्रिय विश्वविद्यालय वर्धा की इंग्लिश पत्रिका HINDI की संपादक रही हैं। उन्हें मिले पुरस्कारों और सम्मानों की सूची में कुछ इस प्रकार हैं। १. सर्वश्रेष्ठ कहानी सम्मान-हिंदुस्तान टाइम्स,दिल्ली. 2.यशपाल कथा सम्मान. उ.प्र.हिंदी संस्थान द्वारा. ३.साहित्य भूषण सम्मान तदैव 4.राम मनोहर लोहिया सम्मान तदैव ५.वनमाली सम्मान ६वाग्देवि सम्मान. 7.सीता स्मृति सम्मान ८.कमलेश्वर स्मृति सम्मान 9 k.k.birla foundation ka.व्यास सम्मान सम्प्रति वे एक उपन्यास और संस्मरणमाला पर कार्य कर रही हैं। उनका पता B 3A/303,Sushant Aquapolis, Opposite Crossings Republic,Ghaziabad,201016. Mobile-9212741322. Email-"

ANYA KA ABHIGYAN

₹200 ₹200
by ANIRUDH UMAT

कवि-कथाकार अनिरुद्ध उमट के आलेखों-समीक्षाओं की यह पुस्तक दरअसल उनके कविकर्म का ही विस्तार है। वे किसी अन्य आसन पर बैठ कर कृति का मूल्यांकन करने, उसे किन्हीं महाविद्यालयीन मापदण्डो से खारिज अथवा पास करने का उपक्रम नहीं करते हैं। वे निखालिस कवि होने की अपनी जमीन पर खड़े हो कर, अपने समय और पूर्ववर्ती कृतियों से रूबरू होते हैं। यहाँ कविता को कविता की शर्तों पर, अक्सर कविता की ही भाषा में पकड़ने की कोशिश देखने को मिलती है। समीक्षाओं, आलेखों की प्रचलित रूखी-सूखी भाषा से इन लेखों का कोई मेल नहीं बैठता दीखता। यहाँ कल्पनाशीलता का लुत्फ कल्पनाशील होकर लिया गया है। इन अर्थों में यह पुस्तक पाठकों के लिए हिंदी आलोचना की सामान्य परिपाटी से अलग कृति और कृतिकार को देखने, समझने की नितान्त नई पीठिका प्रदान करती है। -शंपा शाह

AADHUNIK LAGUKATHAE आधुनिक लघुकथाएं E

₹100 ₹100
by NEERAJ DAIYA

14 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन, राजस्थान (बीकानेर) में सूर्य मंदिर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित एवं नीरज दइया व राजेन्द्र पी जोशी द्वारा संपादित लघुकथा संग्रह उल्लेखनीय रहा है। अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में विधा पर विशद चर्चा, पत्रवाचन और लघुकथा पाठ के साथ ही इसे यादगार बनाने के लिए संभागी रचनाकारों और प्रमुख लघुकथाकारों की रचनाओं को संकलित कर संग्रह ‘आधुनिक लघुकथाएं’ प्रकाशित किया गया। संपादकों ने इस संकलन के लिए जहां प्रतिनिधि और चयनित लघुकथाओं को संकलन के लिए चयनित किया वहीं इसमें शामिल किया है वहीं लघुकथा की शास्त्रीयता (जयप्रकाश मानस) और लघुकथा का वर्तमान (डॉ. अशोक कुमार प्रसाद) के महत्त्वपूर्ण आलेख भी विशद भूमिका के साथ शामिल हैं। यह संकलन न केवल लघुकथा के लेखकों के लिए संग्रहणीय है वरन लघुकथा विधा पर कार्य करने वाले शोधार्थियों और अध्ययनकर्त्ताओं के लिए भी बेहद उपयोगी और संग्रहणीय है।

BULAKI SHARMA KE SRIJAN SAROKAR बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार

₹200 ₹200
by NEERAJ DAIYA

पुस्तक ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ में राजस्थानी और हिंदी के वरिष्ठ लेखक बुलाकी शर्मा के सृजन के साथ-साथ एक आत्मीय भाषा में उनके लेखक को जानने का भी सुंदर और अविस्मरणीय प्रयास आलोचक डॉ. नीरज दइया ने किया है। इस कृति पर लेखक को द्विवेदी युग के ख्यात निबंधकार, विचारक, लेखक बाबू मावलीप्रसाद श्रीवास्तव की स्मृति में प्रतिवर्ष दिया जानेवाला सम्मान 2017 में अर्पित किया गया है। यह सम्मान बाबू मावलीप्रसाद श्रीवास्तव साहित्यपीठ, रायपुर द्वारा प्रतिवर्ष निबंध विधा पर उल्लेखनीय कार्य के लिए प्रदान किया जाता है । यह विशिष्ट सम्मान समीक्षक-निबंधकार श्री नीरज दइया को सृजनगाथा डॉट कॉम के मुख्य संयोजन में आयोजित हुए 14 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के अंलकरण समारोह, उदयपुर, राजस्थान में 11 अक्टूबर, 2017 को प्रदान किया गया। चयन समिति में सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर (पटना), वरिष्ठ लेखिका-समीक्षक डॉ. रंजना अरगड़े (अहमदाबाद), वरिष्ठ कथाकार तथा उ.प्र.हिंदी संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. सुधाकर अदीब(लखनऊ), वरिष्ठ लेखिका, साहित्य अकादमी की सदस्या डॉ. मीनाक्षी जोशी (भंडारा), मावलीप्रसाद श्रीवास्तव साहित्यपीठ, रायपुर के संस्थापक-सचिव-शंकर श्रीवास्तव (रायपुर) तथा जयप्रकाश मानस (संयोजक) थे । पुस्तक के संबंध में चयन समिति ने अपनी संस्तुति में कहा कि “ श्री दइया की इस कृति में संग्रहित निबंध किसी रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने और परखने की कथित रूप से ज़रूरी अकादमिक और क्लासिक परंपरावाली क्लिष्टता और संशलिष्टता के बरक्स आत्मीय और सहज रागात्मक भाषा में मूल्याँकन के नये और कारगर टूल्स को चिह्नांकित करते हैं ।” यह कृति आलोचना की नई भाषा का आगाज करती हमारे समकालीन रचनाकारों पर आलोचनात्मक कार्य किए जाने का महत्त्व भी प्रतिपादित करती है।

TAANYA TAANYA FISS टांय टांय फिस्स

₹200 ₹200
by NEERAJ DAIYA

बीकानेर न केवल साहित्य की उर्वर भूमि है बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पूरे भारत में जाना जाता है।रंगकर्म से लेकर आर्ट गैलरी में समय समय पर लगने वाली प्रदर्शनियों को मैंने निकट से देखा है।एक दर्ज़न से अधिक साहित्यकारों की ख्याति अखिल भारतीय स्तर की है।हिंदी साहित्य वास्तव में बीकानेर का ऋणी है। फ़िलहाल वहाँ के तेजी से उभर रहे व्यंग्य लेखक नीरज दइया की दूसरे व्यंग्य सन्ग्रह”टायं टायं फिस्स” के बारे में कुछ टिप्पणियाँ लिखने का मन है। बीकानेर वह धरा है जहाँ मालीराम शर्मा,डॉ मदन केवलिया,बुलाकी शर्मा,हरदर्शन सहगल जैसे दिग्गज व्यंग्यकारों ने व्यंग्य साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है।मालीराम शर्मा का स्तम्भ लेखन बेहद पठनीय और लोकप्रिय रहा है। ऐसे वातावरण वाले शहर में व्यंग्यकारों का उभरना सामान्य बात है।नए व्यंग्यकारों के लिए अपने इन दिग्गजों से सीखने के विपुल अवसर रहते हैं।चुनौतियाँ भी इन्हीं के लेखन से हैं। नीरज दइया के दूसरे व्यंग्य सन्ग्रह “टायं टायं फिस्स”में कुल 40 व्यंग्य संकलित हैं।उनका शुरुआती व्यंग्य सन्ग्रह से यह व्यंग्य सन्ग्रह काफी परिपक्व है। वैसे अन्य अनुशासनों में नीरज दइया का नाम बेहद जाना पहचाना है,खासकर राजस्थानी साहित्य में।उनके पिताजी स्व सांवर दइया राजस्थानी साहित्य के चर्चित साहित्यकार हुए हैं। नीरज दइया ने यह संकलन राजस्थानी और हिंदी के साहित्यकार मंगत बादल को समर्पित किया है।मंगत जी व्यंग्य भी लिखते हैं।भूमिका जाने माने व्यंग्य कवि भवानीशंकर व्यास विनोद ने बेहद भावुक होकर लिखी है।प्रशन्सात्मक भूमिका नीरज जी को अच्छा और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेगी। ‘ये मन बड़ा पंगा कर रहा है’ व्यंग्य में लेखक कहता है’एक दिन सोचा मन की फ़ोटो प्रति कर ली जाय मगर मन है कि पकड़ में नहीं आता।’फन्ने खाँ लेखक नहीं’में लेखक कहता है-लेखक होना अपने आप में अमर होना है।इस अमरता के लिए ही लेखक मरे जा रहे हैं।”सबकी अपनी अपनी दुकानदारी”में नीरज जी लिखते हैं’अच्छे दिन हैं कि सभी घास खाएं और सोएँ’ ।वी आईं पी की खान व्यंग्य में वी आईं पी कल्चर पर प्रहार किया गया है।साहित्य माफिया में वह लिखते हैं-साहित्य भी एक धंधा बन चुका है।आज किसके पास समय है कि साहित्य जैसे फक्कड़ धंधे में हाथ आजमाए।चीं चपड़….व्यंग्य में कहा गया है-पिंजरा केवल चूहों के लिए ,हम सभी के लिए अलग अलग रूपों में कहीं न कहीं किसी न किसी ने निर्मित कर रखा है। इस व्यंग्य सन्ग्रह में आक्षेप,भर्त्सना,कटाक्ष आदि व्यंग्य रूपप्रचुरता में विद्यमान हैं लेकिन विट,आइरनी,ह्यूमर आदि न के बराबर है।विद्रूप चित्रण से ज्यादा प्रभावी प्रहार हैं।यदि इन सशक्त प्रहारों के साथ विद्रूपता को साध लिया जाय तो नीरज जी का लेखन ऐतिहासिक हो जायेगा।भाषा साधारण किन्तु प्रवाहमयी है। पंच काका की हर व्यंग्य में उपस्थिति से शैलीगत प्रयोग नहीं हो पाये हैं। इस सन्दर्भ में मुझे अपना प्रतिदिन का नवज्योति में कॉलम लिखना याद आ गया।ढाई साल तक मैंने रोजाना व्यंग्य कॉलम लिखा था”गयी भैंस पानी में”शीर्षक से। शुरुआती दिनों में मैं हर व्यंग्य में भैंस को ले आता था,जिससे व्यंग्य की धार कुंद हो जाती।दस दिनों बाद संपादक और मित्रों के टोकने पर मैने शैली बदल दी थी। बहरहाल इस संग्रह के बाद व्यंग्य जगत को नीरज जी से उम्मीदें बढ़ गयीं हैं। - अरविंद तिवारी (वरिष्ठ व्यंग्यकार)

MADHU ACHARYA AASAVADI KE SARJAN SAROKAR मधु आचार्य `आशावादी’ के सृजन-सरोकार

₹200 ₹200
by NEERAJ DAIYA

किसी भी रचनाकार का अपने परिवेश के साथ, अपने समाज के साथ, अपने समय के साथ क्या रिश्ता है यह जानने का अच्छा एवं सही तरीका है उसकी रचना के माध्यम से प्रकट होने वाली उसकी ‘रचनात्मक दृष्टि’। मनुष्य जीवन में भी मनुष्य के हर कार्य के पीछे उसकी ‘दृष्टि’ छुपी होती है और उसी ‘दृष्टि’ के आलोक में हम उस कार्य का और उस कार्य के कारण उस मनुष्य का आकलन करते हैं। इसीलिए जब हम किसी रचनाकार के अब तक प्रकाशित रचनाकर्म का आकलन करने बैठते हैं हमें सबसे पहले यह जानना पड़ता है कि उस रचनाकार की ‘दृष्टि’ क्या है, जो उसकी रचनाओं के माध्यम से हम तक सम्प्रेषित होती है। वह रचनाकार अपने समय के सवालों से कैसे जूझता है, अपने समय को एक शाश्वत समय में कैसे प्रतिष्ठित करता है। हम इससे भी एक कदम पहले लेकर यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि वह अपने समय के सवालों को कैसे उठाता है। अपने समय को प्रश्नांकित करना, अपने समय से मुठभेड़ करना एवं उस मुठभेड़ को एक शाश्वत समय में प्रतिष्ठित करना किसी भी रचनाकार के लिए सबसे बड़ी चुनौति होती है। जो रचना इस कार्य को ठीक तरह से पूरा कर पाती है वह अपने पाठकों का विश्वास अर्जित कर लेती है। श्री मधु आचार्य के सर्जनात्मक सरोकारों पर केन्द्रित यह पुस्तक तत्कालीन समाज के लिए एवं स्वयं रचनाकार के लिए एक आइने का काम करेगी क्योंकि इस पुस्तक के लेखक डॉ. नीरज दइया अपनी इस पुस्तक में श्री मधु आचार्य की रचनाओं में छुपी ‘रचनात्मक दृष्टि’ को समाज के सामने लाने का प्रयास करते हैं जिसके कारण वे रचनाएं एवं उन रचनाओं के माध्यम से स्वयं रचनाकार महत्त्वपूर्ण माना जाता है। श्री मधु आचार्य के रचनाकर्म का आकलन इसलिए भी जरूरी लगता है कि वे एक ही समय में दो भिन्न भाषाओं में साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, व्यंग्य एवं बाल साहित्य के क्षेत्र में निरंतर लिखना एवं स्तरीय लिखना दो अलग अलग बातें हैं। श्री मधु आचार्य के लेखन की विशेषता यही है कि वे दो भिन्न भाषाओं में इतनी साहित्यिक विधाओं में एक साथ सक्रिय रहते हुए भी अपने रचनाकर्म के साथ समझौता नहीं करते। इसलिए भी उनका पाठक वर्ग उन पर उनके रचनाकर्म के कारण विश्वास करता है, उन्हें प्यार करता है। किसी भी रचनाकार के लिए उसके पाठक वर्ग का विश्वास ही सबसे बड़ी पूजी होती है और श्री मधु आचार्य पाठकों के इस विश्वास पर खरे उतरते हैं। कविता और कहानी या उपन्यास और नाटक या कि बड़ों के लिए लेखन एवं बच्चों के लिए लेखन दो भिन्न मानसिकता, दो भिन्न धरातल, भिन्न भाषागत व्यवहार भिन्न शिल्पगत वैशिष्ट्य को साधना है। एक रचनाकार के लिए भाषा को ‘सिरजना’ एवं भाषा को ‘बरतना’ का सांमजस्य बनाये रखना बहुत जटिल कार्य होता है। खास तौर से जब साहित्यिक विधा की अपनी अन्दरूनी मांग ही उससे भाषा के भिन्न ‘वैशिष्ट्य’ को अपने पाठक तक पहुंचाने की चुनौति देती है। इस पुस्तक में लेखक डॉ. नीरज दइया विवेचित रचनाकार के रचनाकर्म के उस वैशिष्ट्य को उसके पाठक तक पहुंचाने के लिए एक ‘सेतु’ बनाने का श्रमसाध्य कार्य करते हुए सामने आते हैं। यही इस पुस्तक की विशेषता है और इस कार्य के लिए डॉ. नीरज दइया को बहुत बहुत बधाई। श्री मधु आचार्य का रचनाकर्म अभी चुका नहीं हैं। उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में वे राजस्थानी एवं हिंदी में और रचनाएं अपने पाठक समुदाय को सौंपेंगे। रंगकर्म के क्षेत्र में उनके लम्बे अनुभव को देखते हुए राजस्थान के रंग सामाजिक को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। वे अपने जीवन में एवं अपने सर्जनात्मक क्षेत्र उत्तरोत्तर उन्नति की ओर बढ़ेंगे यही कामना है। - डॉ. अर्जुनदेव चारण वरिष्ठ कवि-नाटककार-आलोचक

UDE AAGARE KATHAI ऊंडै अंधारै कठैई

₹200 ₹200
by NEERAJ DAIYA

हिन्दी भासा रै ‘चौथा सप्तक’ रा ख्यातनाम कवि नन्दकिशोर आचार्य री अब तांई छपियोड़ी चवदै काव्य पोथ्यां सूं टाळवीं कवितावां रो ओ महताऊ अनुसिरजण ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ जठै डॉ. नीरज दइया री अेक सांतरी उपलब्धि है, बठै ई मायड़ भासा रै अनूदित साहित्य रो अेक गीरबै जोग ग्रन्थ ई है। डॉ. दइया जैड़ै आगीवाण आधुनिक कवि रै, ऊंडै अंधारै कठैई, पूगण रो अैसास आचार्य जी जैड़ै कवि-रिख री आंगळी थाम’र ई संभव हो, क्यूं कै ‘अलेखू उणियारां रै बीच अदीठ’ (इतनी शक्लों में अदृश्य, आचार्य जी रो काव्य संकलन) रो छणिक दीठाव ई नीठ साधना-संभव हुवै है। किणी भी अनुवादक री पैली कसौटी, उण री अनुवाद सारू टाळ्योड़ी रचना हुवै। आंग्ल भासा रै ख्यातनाम अनुवादक ‘फिट्जेराल्ड’ री ऊंचाई, जेकर उण रो खैयाम री रूबायां रो अनुवाद है, तो उण सूं पैली उण री वा दीठ है जिकी खैयाम री प्रज्ञा तांई पूग’र पाछी बावड़ै। वां नै अनुवाद सारू टाळै। वां री महत्ता नै पिछाणै। डॉ. आचार्य जैड़ै सिध अर सारगर्भित कवि री कवितावां नै आपरै अनुवाद सारू टाळ’र डॉ. दइया आपरी चयन-प्रतिभा रो परिचय दियो है। ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै किणी भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री सिरैता ई कही जावैला कै ओ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै बठैई केई कवितावां रो तो शब्दश: अनुवाद ई पाठक रै साम्हीं राखै। आप सारू इण अनूदित कृति ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ मांय आचार्य जी रै अब तांई प्रकाशित चवदै काव्य संकलनां- जल है जहाँ, वह एक समुद्र था, शब्द भूले हुए, आती है जैसे मृत्यु, कविता में नहीं है जो, अन्य होते हुए, चाँद आकाश गाता है, उडऩा सम्भव करता आकाश, गाना चाहता पतझड़, केवल एक पत्ती ने, इतनी शक्लों में अदृश्य, छीलते हुए अपने को, मुरझाने को खिलाते हुए अर आकाश भटका हुआ सूं वां री टाळवी कवितावां लिरीजी है। बै कवितावां जिकी मांय ‘अज्ञेय’ रै सबदां मांय— ‘आंगन के पार द्वार खुलै, द्वार के पार आंगन’ अनै फेर खुलता ई चल्या जावै, अेक अधुनातन अध्यात्म री भासा मांय। - मोहन आलोक राजस्थानी के वरिष्ठ कवि

PANCH KAKA KE JEBI BACHEपंच काका के जेबी बच्चे

₹200 ₹200
by NEERAJ DAIYA

नीरज दइया समकालीन व्यंग्यकारों में एक महत्वपूर्ण नाम हैं। उनका महत्व इस लिए भी बढ़ जाता है क्योंकि व्यंग्य में यह संक्रांति काल है। क्रांति का फल क्या निकलेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है। संक्रांति यह है कि सोशलमीडिया के सुविधाजनक आगमन व हस्तक्षेप से अभिव्यक्ति आसान, निष्कंटक और अपार हो गई है। व्यंग्य केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है। जब वह साहित्य बनता है तब बहुत सारे अनुशासन ज़रूरी होते हैं। ...ऐसे दिलचस्प और दिलनवाज़ माहौल में नीरज दइया जैसे सुलझे व्यंग्यकार अलग से दिखाई देते हैं। नीरज जी को पढ़ते हुए पाठक को एहसास होता है कि उनका परिवेश के साथ गहरा रिश्ता है। क्योंकि वे बहुत सामान्य सी बातों को परख कर उनके तल से मतलब की बात निकालने का हुनर जानते हैं। जैसे 'नियम वहां, जहां कोई पूछे' में भारतीय समाज की सामान्य मानसिकता पर वे चुटकी लेते हैं,'...नियमों के जाल से जिसे बचना आता है वह बच जाता है। ...नियम तो बेचारे उस जाल की तरह है जिसे एक बहेलिए ने बिछाया तो पक्षियों को पकड़ने के लिए था,पर वे होशियार निकले। पूरे जाल को ही लेकर उड़ गए।' कितनी सरलता से नीरज जी शासन प्रशासन न्यायपद्धति नागरिक बोध आदि बातों को आईना दिखा देते हैं। नीरज जी कुछेक व्यंग्यकारों की तरह दूर की कौड़ी नहीं लाते। वे कथात्मक शैली में संवाद करते हुए लिखते हैं। भाषा को उन्होंने साध लिया है। छोटी वाक्यसंरचना उनको भाती है। प्रत्यक्ष कथन और अप्रत्यक्ष संकेत में उनको कुशलता प्राप्त है। 'टारगेटमयी मार्च' में नीरज जी लिखते हैं,'बिना खर्च के आया हुआ बजट लौट जाएगा तो यह सरासर हरामखोरी है। लापरवाही है।कार्य के प्रति उदासीनता है। अनुशासनहीनता है।' अब सोचिए जिस समाज में ऐसे 'परिश्रमी,सतर्क, सचेत,अनुशासित' कर्मचारी होंगे वह समाज प्रगति क्यों न करेगा!!! नीरज जी ने साहित्य के बाहरी भीतरी स्वांगों पर अनेक बार लिखा है। प्रायः हर ज़रूरी व्यंग्यकार ने लिखा है। यह अनुभव का मसला तो है ही,बौद्धिक ज़िम्मेदारी का सवाल भी है। इस बहाने सब पर कोड़े बरसाने वाला व्यंग्यकार ख़ुद पर भी बरसता है। कहना ही चाहिए कि नीरज जी बहुत वक्रता के साथ बरसे हैं। नीरज दइया में एक और हुनर भरपूर है। व्यंग्य मूलतः किस्सागोई, लंतरानी और ललित निबंध आदि के सहभाव से विकसित गद्य रूप है (इसको विधा मानने या न मानने वालों को मेरा सलाम,ताकि मैं सलामत रहूं) इसलिए इसमें बात से बात निकालने और बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी का कौशल आवश्यक है। नीरज जी यह काम करते हैं।'पिताजी के जूते' में वे बात निकालते हैं,'देश से असली जूते गायब हो चुके हैं।किसी के पैरों में कोई जूता नहीं,बस भ्रम है कि जूते हैं। अगर गलती से कोई जूता है तो वह बेकार है।' यहां यह कहना है कि बात निकली है,दूर तलक गई है।ऐसा नहीं हुआ कि बात कहीं और चली गई, मूल मंतव्य कहीं और चला गया। यह नीरज जी का अनुशासन है। मैं नीरज जी को पढ़ता रहा हूं। एक व्यक्ति और लेखक के रूप में उनकी आत्मीयता प्रभावित करती है। बेहद जटिल समय और रचना परिवेश में उनकी उपस्थिति आश्वस्त करती है। उनकी उर्वर रचनाशीलता का अभिवादन। ◆सुशील सिद्धार्थ (वरिष्ठ व्यंग्यकार)

WHATSAAP PEEHU

₹400 ₹400
by ARVIND GHILDIYAL

Border Security Force, one of the most unsung Security Organizations of India has long lived under shadows of Indian Army. Majority of Indian population feels that Indian Army guards the Frontiers of Nation and BSF is an appendage to it. However, BSF is an independent entity under Ministry of Home Affairs, Government of India and has been entasked to guard volatile Indo-Pak Borders and porous Indo Bangladesh Borders. The force personnel of BSF have no peace posting and remain deployed on one border or the other, away from family for most part of year and communicating with them indirectly. The unsung heroes of this force deployed on extreme frontiers of nation, which are remote, inaccessible, incommunicado, braving hostile terrain and harsh climatic conditions are one of the best soldiers in world. In most of the borders, BSF personnel are the only face of the Government for border population. Therefore, a BSF soldier is responsible not only to guard the frontiers 24x7 under fear of unknown but also to redress grievances of border population and provide them succor at time of need. The BSF soldier is trained not only to be physically tough but also to be mentally robust, emotionally stable and have endurance enough to bear stress and strain of leading monotonous and isolated life at borders. Government of India has well looked after interests of BSF personnel, but a life away from family and children haunts the force personnel. The nature of deployment is such that a BSF person do not remain in constant communication with his wife and children and rarely visits home. With disintegration creeping in society, break-up of joint families and adoption of concept of nuclear family, the problems of BSF personnel on domestic front has increased manifold. There is constant worry about the security of wife and children, their upbringing, their education and their well-being. It is said that more often then not, a BSF soldier enjoys honeymoon every year and sees only vertical growth of children. Reason being, the BSF person visits his family once or twice in a year and by the time he adjusts to the family environment, it is time to go back to duty on border. Page 3 In this age and time, the children are exposed to the internet age and more or less have become global citizens. These empowered teenage children think that their parents are of stone-age and know nothing about the worldly affairs. Wife of a BSF soldier has huge task of bringing up children alone and is always in dilemma whether she is doing best for her children and meeting aspirations of husband. The author is blessed with two daughters of which one is in teenage and second is ardent follower of elder one. The teenage daughter has natural rebellious streak in her and is always in argument with her mother on almost every subject. The author not in direct communication with family by virtue of deployment at border and remains in catch 22 situation, whether to entertain complaints of mother or to listen to bright futuristic ideas of daughter, as and when he communicates with them. To bridge the communication gap, Author writes letters to his daughter from border on different subjects and whenever he gets connected to net, sends same through whatsapp to his daughter. Over a period of time, Author has realized that these letters on whatsapp have made positive impact on overall conduct of his daughter and did change her psychology to a large extent. The book is a tribute to all BSF personnel deployed on border away from family and is also means of sharing of experience about guidance to teenage children in a deliberate and calibrated manner. ARVIND GHILDIYAL COMMANDANT

AANGALEE SEEDH आंगळी-सीध

₹300 ₹300
by NEERAJ DAIYA

RAJASTHANI ESSAY BOOKKA ‘आंगळी-सीध’ डॉ. नीरज दइया री महताऊ आलोचना कृति है, जिण में कहाणी अर उपन्यास रौ अंतर इतिहासू रूप सूं दरसायौ गियौ है। उपन्यास रै विकास में ‘कथ्य अर बुणगट’ अर ‘लोक उपन्यास : भरम रा भाठा’ जैड़ा आलोचना लेख राजस्थानी आलोचना नै समृद्ध तो करै ईज है, उण भरम रै जाळां नै ई तोड़ै जिकौ राजस्थानी आलोचना में पसरियोड़ा है। ‘आंगळी-सीध’ 1956 में श्रीलाल नथमल जोशी रै उपन्यास सूं सरू होय’र 2019 में मनोज कुमार स्वामी रै आत्मकथात्मक उपन्यास तक आवै। अन्नाराम सुदामा, यादवेंद्र शर्मा चंद्र, सीताराम महर्षि, पारस अरोड़ा, करणीदान बारहठ जैड़ै उपन्यास लेखकां माथै लिख’र डॉ. दइया राजस्थानी समाज, नारी री ओळखांण, उपन्यास लेखन री परंपरा जैड़ै मुद्दां माथै आलोचनात्मक दीठ देवै। उपन्यास लेखन री इण जातरा रा जिका पड़ाव है उण नै पोखणिया लेखकां में नारी लेखन रौ ई महताऊ पख रैयौ है अर डॉ. दइया उण पख नै ई उजागर कीनौ है। बसंती पंवार, रीना मेनारिया, अनुश्री राठौड़ अर संतोष चौधरी रै उपन्यासां री आलोचना बांचता आ बात साफ हो जावै कै राजस्थानी रै उपन्यास लेखन में आ भागीदारी अजंसजोग है। युवा उपन्यासकारां में अतुल कनक, अरविंद आशिया, रामेसर गोदारा, भरत ओळा जैड़ा नांव भरोसौ देवै कै उपन्यास लेखन री नवी पीढ़ी वरिष्ठ उपन्यासकारां रै मारग नै सून्याड़ नीं वापरण देवैला। श्याम जांगिड़, नंद भारद्वाज, नवनीत पाण्डे, देवदास राकांवत, रतन जांगिड़, मधु आचार्य, जितेंद्र निर्मोही, प्रमोद शर्मा, पूरण शर्मा अर मनोज कुमार स्वामी रा नांव उपन्यास-जगत नै थ्यावस देवणाआळा नांव है अर आज रै समाज रै बदळतां हालातां, सपनां, आधुनिकता-बोध नै सबळाई सूं उजागर कीनौ है। आलोचक डॉ. नीरज दइया आपरी दीठ में कोई पूर्वाग्रह नीं राखै अर तटस्थ भाव सूं आपरी बात राखै। अठै आ बात उल्लेखजोग है कै डॉ. नीरज दइया आपरी दीठ पाठकां सांमी राखै अर पछै विकास री पड़ताळ करै। इण पड़ताळ-जातरां रा निजू भाव, वां री निजू विचारणा इण उपन्यासां नै किणी गत प्रभावित कीना है, अै बातां ई लेखक घणी ई सावचेती सूं पाठकां सांमी राखी है। उपन्यासां रौ आलोचकीय लेखौ-जोखौ इण गत पैलीबार सांमी आयौ है, इण सूं लागै कै उपन्यासां रौ कथा-फलक अर भासा-रूप भांत-भांत रौ है अर आ बात राजस्थानी उपन्यासां री सबळता उजागर करै। राजस्थानी उपन्यास-आलोचना रौ औ अेक सबळ पड़ाव है अर म्हनै लागौ कै ‘आगंळी-सीध’ आवण आळै उपन्यास लेखन माथै जबरदस्त असर करैला अर उपन्यास लेखन नै सबळ अर विचार-प्रवण बणावैला। – डॉ. आईदान सिंह भाटी (वरिष्ठ कवि-आलोचक)

RAJASTHANI SAHITYA KA SAMKAL राजस्थानी साहित्य का समकाल

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by NEERAJ DAIYA

किसी भी भाषा का साहित्य केवल सामयिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहता बल्कि उसमें सम्बंधित देश-काल का इतिहास, परंपरा, आस्था, जीवन मूल्य व लोकरंग समाहित रहते हैं। राजस्थानी भाषा के साहित्य के संदर्भ में यह बात खास तौर पर कही जा सकती है। संवैधानिक मान्यता के अभाव के बावजूद राजस्थानी के समकालीन साहित्य में यहाँ के परिवेश व सरोकारों की अभिव्यक्ति जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही महत्वपूर्ण है उसकी वैश्विक चेतना। राजस्थान की सुरंगी संस्कृति की तरह राजस्थानी साहित्य भी बहुरंगी रहा है। वरिष्ठ आलोचक डॉ नीरज दइया ने 'राजस्थानी साहित्य का समकाल' कृति में हिंदी के माध्यम से दुनिया को राजस्थानी साहित्य की मूल चेतना को जानने-समझने का अवसर सुलभ करवाया है। करीब एक हजार साल पुरानी भाषा के साहित्य में परंपरा की अविरल धारा के साथ आधुनिक भाव बोध को रेखांकित करती यह आलोचना-कृति विविध विधाओं व विमर्शों पर अपने आलेखों से पाठकों को पूर्वाग्रहों से मुक्त करके सम्पन्न बनाती हैं। अनुवाद वह खिड़की है जिससे भाषाओं के बीच परस्पर आवाजाही बनी रहती है। आलोचना विधा के माध्यम से यह कृति इसी काम को नए तरीके से पूर्ण करती है जो अनुवाद से आगे का पड़ाव माना जा सकता है। गवेषणा के साथ समुचित उदाहरणों से किसी अभिमत की पुष्टि इस किताब की खासियत है। भारतीय भाषाओं के बीच राजस्थानी साहित्य की समालोचना की यह पहल नई होने के साथ सार्थक भी है। कहना न होगा, इस कृति से हिंदी आलोचना का फलक अधिक विस्तृत व समृद्ध हुआ है। - डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

Isawar han Neen To ईस्वर : हां, नीं… तो

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by NEERAJ DAIYA

नीरज दइया दूजी भासावां री रचनावां रो राजस्थानी में अनुसिरजण करनै राजस्थानी साहित्य रै पाठकां नै नवी भाव-भूमि, नवी बुणगट-कथ री रचनावां बरसां सूं सूंपता रैया है। अमृता प्रीतम, भोलाभाई पटेल, निर्मल वर्मा, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना जिसा आप आप री भासावां रा नामी रचनाकारां री रचनावां बै अनुसिरजण रै मारफत राजस्थानी पाठकां तांई पूगाय’र बां नै भारतीय साहित्य सूं परिचित करावण में महतावू भूमिका निभाई है। बां आपरै कविता-संग्रै ‘सबद-नाद’ रै मारफत चौबीस भारतीय भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां राजस्थानी पाठकां साम्हीं राख नै सरावणजोग काम कर्यो है। सुधीर सक्सेना ई आपरै हिंदी संसार रै पाठकां नै विदेसी भासावां रै सिरजकां सूं, जरियै अनुसिरजण, मिलावता रैय है अर नीरज दइया राजस्थानी पाठकां नै भारतीय भासावां रै सिरजकां सूं रू-ब-रू करावतां रैवै। सुधीर जी रूसी, पोलिश, ब्राजील आद विदेसी भासावां रै कवियां साथै भारतीय भासावां रै कवियां री रचनावां रो हिंदी अनुसिरजण कर्यो है, बठै ई नीरज दइया हिंदी, गुजराती, पंजाबी समेत अनेक भारतीय भासावां री रचनावां अनुसिरजण रै मारफत राजस्थानी पाठकां तांई पूगाय’र बांरी सोच अर दीठ नै सिमरध करी है। निखालिस अनुवाद कै अनुसिरजक अर कवि-अनुसिरजक में खासो फरक हुवै। निखालिस अनुवादक री कोसीस रैवै कै दूजी भासा री बेसी सूं बेसी रचनावां आपरी भासा रै पाठकां तांई पूगती करी जावै, पण जिको कवि है अर अनुसिरजक ई, बो बीसी टाळवीं रचनावां आपरी भासा रै पाठकां तांई पूगावणी जरूरी समझै जिकी उण भासा नै कथ-बुणगट-चिंतन आद ढाळा माथै नवै तरीकै सूं सोचण नै मजबूर करै। सुधीर सक्सेना रो कविता-संग्रै ‘ईस्वर : हां, नीं... तो’ बांचता राजस्थानी पाठकां नै लागसी कै ईस्वर सूं इण ढंग-ढाळै रा सवाल बै पैली बार सुण रैया है अर बै ही कवि साथै बां रै पड़ूत्तर री उडीक राखै। - - बुलाकी शर्मा (वरिष्ठ कहानीकार-व्यंग्यकार)

Koi Koni Batho Thalo कोई कोनी बैठो ठालो

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by NEERAJ DAIYA

आधुनिक राजस्थानी साहित्यकारां री नवी पीढी रै हरावळ में डॉ. नीरज दइया अेक सरब मांनीतौ अर बाजिंदौ नांव। बरस 1989 मांय नीरज री पैली पोथी रै रूप में लघुकथा संग्रै छप्यौ हौ। उण संग्रै सूं लेयर अबार तांईं साहित्य री न्यारी-न्यारी विधावां मांय वां री लगैटगै चाळीस नैड़ी पोथ्यां छप चुकी है। म्हैं नीरज नै उणरै टाबरपणै सूं जांणूं जद सूं वौ कलम सांभी ही। नीरज रा जीसा राजस्थानी अर हिंदी रा चावा अर ठावा साहित्यकार सांवर दइया फगत म्हारा गाढा मीत ई नीं हा, म्हारै सारू वै सगा भाई सूं ई बता हा। घणी ई कमती उमर लिखायनै लाया हा, पण आपरी इण ओछी उमर में ई वै राजस्थानी में गद्य-पद्य साहित्य रौ सांवठौ सिरजण कर निरौ ई जस कमायौ अर हरावळ रै साहित्यकारां रै बिचाळै आपरी ठावी ठौड़ बणाय अनै मांन-सनमांन ई पायौ। राजस्थानी कहाणी-संग्रै ‘अेक दुनिया म्हारी’ माथै बरस 1985 में वांनै साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली रौ पुरस्कार ई मिळियौ। गुमेज री बात कै वै नीरज नै उणरै टाबरपणै में ई साहित्य सिरजण रा संस्कार अर समझ सूंपग्या। नीरज दइया आपरी इणी समझ अर ऊरमा रै पांण अेकण कांनी लघुकथा, बाळकथा, कविता, समीक्षा-आलोचणा, व्यंग्य इत्याद साहित्य विधावां में मौलिक सिरजण करनै तौ दूजै ई कांनी पत्रिकावां अर पोथ्यां रौ संपादन अर उल्थौ-अनुसिरजण रौ सांवठौ कांम कर जस कमायौ है। सम माथै आयनै म्हैं उल्थाकार नीरज री बात करूं तौ कैवणौ पड़ैला कै लारलै बरसां में वै कीं खासा कांम करिया है जिण सूं वां री पैठ सवाई व्ही है। वां रै इण कांम री राजस्थानी ई नीं हिंदी पट्टी में ई घणी सरावण व्ही है। हिंदी मांय ‘101 राजस्थानी कहानियां’ अर ‘रेत में नहाया है मन’ जिसी पोथ्यां रै ओळावै, राजस्थानी सूं उल्थौ कर हिंदी मांय आधुनिक राजस्थानी कहांणी अर कविता नै लेय जावण रौ गीरबै जोग कांम करियौ है। वठै ई अपां नीरज रै करियोड़ौ केई पोथ्यां रौ उल्थौ ई देख सकां। बरस 2000 मांय वां रै अनुसिरजक री ओळख ‘कागद अर कैनवास’ (अमृता प्रीतम) सूं व्ही। निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, सुधीर सक्सेना, ओम गोस्वामी, डॉ. संजीव कुमार आद री पोथ्यां राजस्थानी मांय अर मोहन आलोक, मधु आचार्य ‘आशावादी’ री पोथ्यां हिंदी मांय लेय जावण रौ सिरजणाऊ कांम वां री साख नै बधावै। भारतीय भासावां की टाळवीं कवितावां रौ संग्रै ‘सबद नाद’ अर राजस्थानी रै मोट्यार कवियां री कवितावां रौ संग्रै मंडाण’ नीरज री सिरजणाऊ दीठ री साख भरै। अै कांम घणै बगत तांई याद राखण जोगा है। आप जांणौ ई हौ कै नीरज रै करियोड़ै उल्था मांय डॉ. नंदकिशोर अचार्य री टाळवीं कवितावां रौ संग्रै ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ छप्यौ, जिण नै ‘कथा संस्थान, जोधपुर’ राज्य स्तरीय डॉ. नारायणसिंह भाटी सम्मान भेंट करनै वां रै अनुसिरजण री सरावणा ई करी। ...इण तरै नीरज री आज तांईं री पूरी रचनात्मकता रै ओळावै म्हैं इतरौ कैय सकूं कै ‘भूतौ न भविष्यति’ जैड़ी बात बणी है। जयप्रकाश मानस हिंदी रा चावा अर ठावा कवि हैं। आपरी कवितावां रै कथ्य रौ पाट ई घणौ चौड़ौ है- गांव-गुवाड़, स्हैर अर महानगर तांईं ई नीं इण मांय स्रस्टि जगत रा सगळा ई कुदरती वौपार समायोड़ा है तौ आपरै बगत रै बायरै सूं ई वै अणजांण कोनीं रैवै। आपरी कविता री भासा, भाव अर बुणगट रै ओळावै कूंत करतां म्हैं कैय सकूं कै मानस जी गागर में सागर भरणिया कवि है। आपरी कवितावां बिंबां अर प्रतीकां रै ओपतै अर फाबतै प्रयोग सूं सवाई व्ही है। घणै गीरबै रै सागै अठै म्हैं अठै आप पढाकां सारू दो बिंबात्मक कवितावां निजर कर रैयौ हूं : कोई कोनी बैठो ठालो/ कीड़ा ई सड़्या-गळ्या पानड़ा नै खावै/ कीं रेसम बणावै/ अळिया आसोज आयां सूं पैली/ उथल-पुथल कर देवणी चावै धरती बन-पांखी ई तिणकला-कचरै नै बदळ रैया आळै मांय/ भंवरा फूंलां सूं अंवेरै रस/ अर सांप धान-बिगाड़ ऊंदरां री ताक मांय/ काळै बादळां रै पंजां सूं किरणां नै बचावण/ कसमसीजतो चांद पिरथवी रै रूपास मांय आं रो ई कीं सायरो हुवैला/ आं मांय सूं किणी नै ठाह कोनी/ फेर ई बै है कै लाग्योड़ा इणी रामधुन मांय अर अठीनै/ रूपाळी पिरथ्वी रै सुपनां माथै फगत बकबक। (कोई कोनी बैठो ठालो, पेज-36) ०००० थोड़ी’क घास/ थोड़ी’क झाड़्यां/ कमर माथै बैठ/ गीत गांवती चिडक़लियां/ थोड़ी’क बावडिय़ां/ थोड़ा’क छियां आळा रूंख/ इण सूं बेसी कीं कोनी हुवै/ छाळ्यां रै सुपनां मांय। (सुपनो, पेज-42) मानस जी साहित्य सिरजण रै अलावा दूजै कांनी ‘राजभाषा हिंदी’ रै प्रचार-प्रसार खातर जसजोग कांम सांभ राख्यौ है। वै देस-विदेस में सतरै-अठारै ‘अन्तरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनां’ रौ तेवड़ कर चुक्या है। म्हनै वां रै साथै तासकंद-उज्बेकिस्तान अर मास्को-रूस री जातरा करण रौ सुख मिळयौ है। नीरज जद म्हनै मानस जी री हिंदी कवितावां रै उल्था री आ पांडुलिपि खिनाई तद लारली सगळी बातां म्हारै चितार चढगी। विचार आयौ कै कितरा भारी खंवा मिनख है, मानस जी। अैड़ा लाखीणा मिनख सोध्यां ई कठै मिळै है! कवि ई उतरा ई मोटा। जयप्रकाश मानस री टाळवीं कवितावां रौ औ संग्रै ‘कोई कोनी बैठो ठालो’ सांचांणी अेक अणमोल हेमांणी मांनीजैला। राजस्थानी पढाकां रै मन-मगज में पकायत ई चांनणौ करैला। अनुवादक नीरज दइया रै इण सांतरै उल्थै नै भणियां यूं लागै जांणै खुद मानस जी आं कवितावां नै मूळ राजस्थानी मांय ई सिरजी है, आ इण उल्थै री सरावणजोग बात है। अठै म्हैं राजस्थानी भासा री अेकरूपता पेटै ई बात करणी चावूं कै अबै बगत आयग्यौ है जद आपां सगळां नै हिळ-मिळ बैठनै अेक निरणै माथै पूगणौ है जिण सूं आवण आळी पीढी भासा री अेकरूपता पेटै आपरी समझ अर सोजी नै सखरी अर खरी कर सकै। दाखलै रूप बात कैवूं तौ ओकारांत री ठौड़ औकारांत रौ नेम मांनणौ राजस्थानी री मोटी जरूरत है, जिकौ सईकां सूं राजस्थानी भासा री एक अलायदी पिछांण बणायोड़ौ है। अेकरूपता सारू बीजी औरूं ई केई बातां हैं जिकी बगत-बगत माथै साहित्यकारां तै करी है। खैर अै बातां फेरूं ई विगतवार कदैई करसूं। सार रूप मांय कैवूं तौ ‘कोई कोनी बैठो ठालो’ अनुसिरजण संग्रै री अेकूकी कविता नै म्हैं घणी गैराई में जायनै बांची-देखी-परखी है। जिण रूप मांय आपां रै सांम्ही है उणनै भणिया कैयौ जा सकै कै ओ भारतीय कविता रै सीगै अेक महतावू अनुसिरजण संग्रै है। इण संग्रै रै उल्थाकार कवि डॉ. नीरज दइया नै सरावण जोग उल्थै सारू घणां-घणां रंग। - - मीठेस निरमोही (वरिष्ठ कवि-संपादक)